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पांच सात दिन ही है सोचने के लिए ...

पांच सात दिन ही है सोचने के लिए ...

मौसम में बदलाव है। दिनों ने तो गर्मी से गपशप शुरू कर दी, लेकिन रातें अभी भी सर्दी की गिरफ्त मे है। 
इधर चुनाव का ये मौसम, सर्दी और गर्मी दोनो पर भारी पडने लगा है।
बहरहाल अधिकांश वार्डो मे टेम्पप्रेचर हाई है। गलत टिकट के विरोध उठ रहे है। 
वैसे इस बार सरकार ने भी सेटलमेन्ट करने का खासा वक्त दिया है। ताकि ले देकर बगावत करने वालो को बैठा सके। कुछ निर्दलीय तो इसी मकसद मे खड़े होते है। उनके तो जो आया वो लाॅटरी।

चमचे टिकट पर अपना पहला हक समझते है। उनका फार्मूला यह होता है कि वार्ड से ज्यादा नेताऔ के चरणों मे नजर आऔ तो टिकट पक्का। 
 
हुआ भी यही, कई अच्छे योग्य और वार्डवासी के बजाय "अपनो" को रेवड़ी बांटी गयी और कुछ जगह बेची गयी।
 
मै यह नही कह रहा कि सब जगह अयोग्य व्यक्ति को टिकट हुए। कुछ जगह सही भी है। लेकिन यह फैसला नेता, मैं, या आप नही कर सकते। इसका फैसला वार्ड पर छोडना चाहिए। वो भी टिकट से पहले कि "भाईयों आपके वार्ड से कोई अच्छा नाम सुझाइये... 
हंसी आती है कि ऐसा कभी होता है कि नेताजी वार्ड मे आये और सबकी सलाह ले। ऐसे तो चमचा प्रजाति लुप्त हो जायेगी।
बहरहाल मेरा मानना ये है कि इन सब बातों को दरकिनार करते हुए, अपने अपने वार्ड से  अच्छे व्यक्ति को समर्थन दे। वो किसी भी पार्टी से हो, चाहे निर्दलीय हो। पार्टी सिम्बल को  मजबूरी मत बनाइये।
 नेता तो हमेशा यही चाहेगें कि मतदाता हमेशा भेड़ो की तरह उनके पीछे पीछे चलते रहे। 
जहां इधर उधर होने की कोशिश करे वहां मोदी जी का या राहुल जी का फोटो दिखाकर फिर से लाईन पकडा दे। 
इस कला को इमोशनली ब्लेकमैल कहते है।
आने वाली शिक्षित पीढियां तो बहुत कुछ बदल देगी। लेकिन हमारी, आपकी भी कुछ तो सोच और जिम्मेदारी बनती है।ये पांच सात दिन ही है सोचने के लिए ...बाकि तो फिर वो ही रोजमर्रा की जिन्दगी.. 
(Kgkadam)

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